ऐसे ही एक सुबह के सफर पर निकला हूं जिंदगी की तलाश में, पंच तत्वों से बना ये शरीर शहर के शोर-शराबे के जिंदगी से निकलकर ऐसे ही पहाड़ों में गुम हो जाना चाहता है, जहां ना रेत से सपने हैं, ना दौलत से इश्क है, बस हवाओं की ठंडी झरोके हैं, निर्मल सा मन है जो दिल में दस्तक देता है कुछ पल के लिए नहीं एक उम्र मिल जाए यहां बिताने को|
जब सुबह नींद से जागूँ तो बिस्तर नहीं पहाड़ों की गोद हो, सुबह की चाय मानो अमृत हो इन पहाड़ों में जो उबलते जिंदगी में मीठी चासनी घोल देती है, फिर कमबख्त यह मन कहां मानता है और तसव्वुर में गोते लगाने लगता है|
तब जाकर मैं अपने उस वजूद से मिलता हूं जो इन शोर-शराबे बाली जिंदगी से बिल्कुल अलग है जहां सिर्फ मैं रहता हूं|
हां... सिर्फ मैं! 🙂
~सानू सम्राट